Monday, 16 December 2024

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में कई महत्वपूर्ण बदलाव सचिन कुमार मिश्रा

 


                                  योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में कई महत्वपूर्ण बदलाव 


योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं, जो राज्य के प्रशासन, सुरक्षा, और विकास के दृष्टिकोण से देखे जा सकते हैं। कुछ प्रमुख बदलाव निम्नलिखित हैं:


सुरक्षा और कानून व्यवस्था: योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को सख्त बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। अपराधों में कमी और अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के कारण राज्य में सुरक्षा की स्थिति में सुधार हुआ है। "एन्काउंटर नीति" के तहत कई अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की गई।


इन्फ्रास्ट्रक्चर और विकास: राज्य में सड़क निर्माण, एक्सप्रेसवे, मेट्रो परियोजनाओं और एयरपोर्ट के विकास में तेजी आई है। उदाहरण के लिए, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, और बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे जैसी बड़ी परियोजनाओं को महत्व दिया गया है।


आर्थिक सुधार और निवेश: योगी सरकार ने राज्य में निवेश आकर्षित करने के लिए "यूपी इन्वेस्टर्स समिट" जैसी पहलों की शुरुआत की, जिसके परिणामस्वरूप कई बड़ी कंपनियों ने राज्य में निवेश किया। इससे राज्य की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और रोजगार के अवसर पैदा हुए।


स्वास्थ्य और शिक्षा: योगी सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में कई सुधार किए, जिनमें सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण, मेडिकल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि, और कोविड-19 महामारी के दौरान स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना शामिल है। शिक्षा के क्षेत्र में भी कई योजनाएं लागू की गईं, जैसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना और स्कूलों में सुविधाओं का सुधार।


कृषि और किसान कल्याण: योगी सरकार ने किसानों के लिए कई योजनाएं लागू कीं, जैसे कि किसान सम्मान निधि, सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार, और कृषि की डिजिटलाइजेशन। इसके साथ ही, राज्य में कृषि उपज की बाजार व्यवस्था में भी सुधार किया गया।



                                                  

धार्मिक और सांस्कृतिक पहल: योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश को धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के केंद्र के रूप में प्रमोट किया है, जैसे कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन।


हालांकि, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में कई सकारात्मक बदलाव आए हैं, लेकिन आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है, जैसे कि धार्मिक ध्रुवीकरण और मानवाधिकारों से संबंधित मुद्दों पर विवाद। फिर भी, उनकी सरकार ने राज्य के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने और विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।


                                                              @sachin kumar Mishra 

Sunday, 15 December 2024

 

   2025 में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति  कैसा होगा सचिन कुमार मिश्रा

Economists Sachin Kumar Mishra

      (ATF Secretary Delhi)

2025 में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति विभिन्न कारकों पर निर्भर करेगी, जिनमें सरकार की नीतियाँ, वैश्विक आर्थिक परिप्रेक्ष्य, और घरेलू विकास शामिल हैं। हालांकि, कुछ प्रमुख दृष्टिकोणों से भारतीय अर्थव्यवस्था की संभावित स्थिति का विश्लेषण किया जा सकता है:

 

विकास दर: भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 2025 में भी मजबूत रहने की संभावना है, हालांकि यह covid-19 महामारी के प्रभाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण कुछ उतार-चढ़ाव का सामना कर सकती है। भारत 5-7% की दर से वृद्धि कर सकता है, अगर वैश्विक परिस्थितियाँ अनुकूल रहती हैं और घरेलू सुधार सही दिशा में चलते हैं।

कृषि और विनिर्माण क्षेत्र: कृषि क्षेत्र में सुधार के प्रयास जारी रहेंगे, लेकिन शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के साथ विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की भूमिका बढ़ेगी। भारत के "मेक इन इंडिया" और "आत्मनिर्भर भारत" जैसे अभियानों से औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि की संभावना है।

बेरोजगारी और मानव संसाधन: बेरोजगारी में कुछ सुधार हो सकता है, खासकर अगर सरकार कौशल विकास और रोजगार सृजन के लिए ठोस कदम उठाती है। हालांकि, यह पूरी तरह से नीतिगत बदलावों और निजी क्षेत्र में निवेश की दर पर निर्भर करेगा।

नवाचार और प्रौद्योगिकी: भारत में डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और नई तकनीकों का प्रभाव बढ़ने की संभावना है, जैसे कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और रिन्यूएबल एनर्जी। ये क्षेत्रों में नवाचार से अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है।

वैश्विक व्यापार: 2025 में वैश्विक व्यापार के क्षेत्र में भी वृद्धि की उम्मीद है, जिससे भारत के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, चीन और अन्य देशों के साथ व्यापारिक संबंधों में चुनौती भी हो सकती है।

सरकारी नीतियाँ और सुधार: सरकार द्वारा नई नीतियाँ, जैसे कि कर सुधार, शहरीकरण, और अवसंरचना परियोजनाओं पर निवेश, भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं। यदि सरकार व्यवसायों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में सफल होती है, तो यह अर्थव्यवस्था के विकास को तेज़ कर सकता है।

 

सारांश में, 2025 तक भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित स्थिति में हो सकती है, जहाँ उच्च विकास दर, नवाचार, और सुधारों के बावजूद कुछ चुनौतियाँ भी सामने सकती हैं।


Monday, 17 January 2022

श्रीराम के सोलह गुण, जो हममें होने चाहिए

 श्रीराम के सोलह गुण, जो हममें होने चाहिए

वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के ऐसे ही सोलह गुण बताए गए हैं, जो लोगों में नेतृत्व क्षमता बढ़ाने व किसी भी क्षेत्र में अगुवाई करने के अहम सूत्र हैं।


1 गुणवान (ज्ञानी व हुनरमंद)

2 किसी की निंदा न करने वाला (सकारात्मक)

3 धर्मज्ञ (धर्म के साथ प्रेम, सेवा और मदद करने वाला)

4 कृतज्ञ (विनम्रता और अपनत्व से भरा)

5 सत्य (सच बोलने वाला, ईमानदार)

6 दृढ़प्रतिज्ञ (मजबूत हौंसले वाला)

7 सदाचारी (अच्छा व्यवहार, विचार)

8सभी प्राणियों का रक्षक (मददगार)

9 विद्वान (बुद्धिमान और विवेक शील)

10 सामथ्र्यशाली (सभी का भरोसा, समर्थन पाने वाला)

11 प्रियदर्शन (खूबसूरत)

12 मन पर अधिकार रखने वाला (धैर्यवान व व्यसन से मुक्त)

13 क्रोध जीतने वाला (शांत और सहज)

14 कांतिमान (अच्छा व्यक्तित्व)

16 वीर्यवान (स्वस्थ्य, संयमी और हष्ट-पुष्ट)




Ayodhya



Wednesday, 1 July 2020

रामायण महाभारत और गीता


जीवन में क्या करे ये आपको रामायण सिखाता है। 
      जीवन में क्या नहीं करे आपको महाभारत सिखाता है।
   जीवन को कैसे जीना है आपको गीता सिखाता है।  



1. बुराई पर अच्छाई की जीत -
रामायण की सबसे बड़ी सीख है कि बुराई पर हमेशा अच्छाई की ही जीत होती है। जिस तरह माता सीता पर रावण ने बुरी नज़र डाली और अंत में भगवान राम ने रावण को पराजित कर सीता को वापस पा लिया।

कहानी का सार है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली या बड़ी क्यों ना हो लेकिन अपनी अच्छी नीयत और गुणों के कारण सच्चाई की ही जीत होती है।



2. विविधता में एकता
रामायण की एक बड़ी सीख है विविधता में एकता। इस महाकाव्य में राजा दशरथ की तीनों रानियों और चारों बेटों का चरित्र अलग-अलग होता है।

लेकिन इस विविधता के बावजूद उनमें किस तरह की एकजुटता रहती है यह हर परिवार के लिए दुःख के समय से बाहर निकलने की सीख है।



3. ऐश्वर्य से बढ़कर रिश्ते -
भाइयों का ऐसा प्यार जहां लालच, गुस्सा या विश्वासघात घर नहीं कर पाया, ये एक बड़ा उदाहरण है। एक और जहां लक्ष्मण ने 14 साल तक भाई राम के साथ वनवास किया वहीं दूसरे भाई कैकयी के पुत्र ने राजगद्दी के अवसर को ठुकरा दिया।

इसके बजाय, उन्होंने भगवान राम को उन्हें माफ करने और राजकाज संभालने का आग्रह किया क्यों कि इस पर राम का ही हक था। भाइयों के प्यार की ये सीख हमें लालच और सांसारिक सुखों के बजाय रिश्तों को महत्व देने के लिए प्रेरित करती है।



4. अच्छी संगति का महत्व
यह ग्रंथ हमें अच्छी संगति के महत्व को बताता है। कैकयी राम को अपने पुत्र राम से ज़्यादा चाहती थी लेकिन दासी मंथरा की बुरी सोच और गलत बातों में आकर वह राम के लिए 14 वर्षों का वनवास मांग लेती है।

इसलिए हमें सीख मिलती है कि हमें अच्छी संगति में रहना चाहिए ताकि नकारात्मकता हम पर हावी ना हो।



5. सच्ची भक्ति और समर्पितता
हनुमान जी ने भगवान राम के प्रति अटल विश्वास और प्यार का परिचय दिया। उनकी अपार लग्न और भगवान राम के प्रति निःस्वार्थ सेवा हमें सिखाती है कि एक दोस्त की ज़रूरत के समय किस तरह मदद की जाती है।


यह बताती है कि हमें अपने आराध्य के चरणों में बिना किसी संदेह के अपने आप को समर्पित कर देना चाहिए। जब हम अपने आपको उस सर्वव्यापक के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तो हमें निर्वाण या मोक्ष की प्राप्ति होती है और जन्म-मरण से छुटकारा मिलता है।


6. माफ़ करना बदला लेने से अच्छा चरित्र है
रावण एक ज्ञानी पुरुष था लेकिन माता सीता का अपहरण करना उसके पतन का कारण बना। इससे पता चलता है कि हम दूसरे को नुकसान पहुंचाने के चक्कर में बदले की आग में अपने आप को ही जला बैठते हैं।

अपनी बहन सूर्पनखा की लक्ष्मण द्वारा बेइज्जती करने पर रावण उसके भाई राम को सबक सिखाने की सोचता है और क्रोध, विश्वासघात और प्रतिशोध के खुद के जाल में खुद ही उलझ जाता है। इसलिए हमें बदले, अहम और क्रोध के बजाय माफ़ करने का स्वभाव अपनाना चाहिए।



7. सबसे समान व्यवहार
भगवान राम का विनम्र आचरण और अपने से बड़ों और छोटों सबको सम्मान देना हम सबको एक सीख देता है। हमें रुतबा, उम्र, लिंग आदि के भेदभावों के बावजूद सबसे समान व्यवहार करना चाहिए। हमें पशुओं से भी प्यार और दयालुता से पेश आना चाहिए। सच्चा मानव वही है जो सबसे समानता से पेश आता है।


8. भगवान की सच्ची सेवा
राम के वन जाने से पहले लक्ष्मण और उनकी मां सुमित्रा के बीच संवाद होता है जहां वे लक्ष्मण को राम और सीता के साथ आचरण की शिक्षा देती हैं, तब वे बताती हैं कि भगवान की सच्चे मन से सेवा करनी चाहिए क्यों कि ये ही मुक्ति का द्वार है। सुमित्रा कहती हैं कि हे लक्ष्मण तुम चाहे राम और सीता के साथ कहीं भी रहो लेकिन जहां राम हैं वहीं पूरी अयोध्या है। वे लक्ष्मण को अपनी क्षमता के अनुसार भगवान की सेवा करने करने के लिए कहती हैं क्यों कि यही सबसे बड़ा काम है और जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है।



9. भगवान में विश्वास की शक्ति
राम, लक्ष्मण और वानर सेना द्वारा भारत और श्रीलंका के बीच तैयार किया गया पुल चमत्कार की ही निशानी है। जिस तरह से भगवान का नाम लिखने से ही पत्थर तैरने लगे।

ये भी एक बड़ी सीख है कि जिस भगवान का नाम लेने से सब लोग पुल से सागर पार कर गए वैसे ही उसका नाम लेने से इस भवसागर से पार हो सकते हैं और हर क्षेत्र में जीत हासिल कर सकते हैं।


10. प्यार और दया
भगवान राम प्यार, दया और सकारात्मकता की प्रतिमूर्ति हैं और यदि हममें से कोई भी 10 प्रतिशत भी अपने दैनिक जीवन में उतार लेता है तो वो खुशहाल और संतुष्ट जीवन जी सकता है।

उनका शांत और दया भाव से एक पुत्र, पति, भाई और एक राजा की जिम्मेदारियों का निर्वहन करना हमें आपसी प्रेम और सम्मान जैसे मानवीय गुणों से अवगत कराता है


समाज की बुराइयों पर जीत हासिल करने के लिए हमें आज के जमाने में रामायण की सीख को उतारने की आवश्यकता है।
                                   



1.हो योजनाओं से भरा : जीवन के किसी भी क्षेत्र में बेहतर रणनीति आपके जीवन को सफल बना सकती है और यदि कोई योजना या रणनीति नहीं है तो समझो जीवन एक अराजक भविष्य में चला जाएगा जिसके सफल होने की कोई गारंटी नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के पास पांडवों को बचाने का कोई मास्टर प्लान नहीं होता तो पांडवों की कोई औकात नहीं थी कि वे कौरवों से किसी भी मामले में जीत जाते।

2.संगत और पंगत हो अच्‍छी : कहते हैं कि जैसी संगत वैसी पंगत और जैसी पंगत वैसा जीवन। आप लाख अच्छे हैं लेकिन यदि आपकी संगत बुरी है, तो आप बर्बाद हो जाएंगे। लेकिन यदि आप लाख बुरे हैं और आपकी संगत अच्छे लोगों से है और आप उनकी सुनते भी हैं, तो निश्‍चित ही आप आबाद हो जाएंगे। कौरवों के साथ शकुनि जैसे लोग थे जो पांडवों के साथ कृष्ण। शकुनि मामा जैसी आपने संगत पाल रखी है तो आपका दिमाग चलना बंद ही समझो।

3.अधूरा ज्ञान घातक : कहते हैं कि अधूरा ज्ञान सबसे खतरनाक होता है। इस बात का उदाहरण है अभिमन्यु। अभिमन्यु बहुत ही वीर और बहादुर योद्धा था लेकिन उसकी मृत्यु जिस परिस्थिति में हुई उसके बारे में सभी जानते हैं। मुसीबत के समय यह अधूरा ज्ञान किसी भी काम का नहीं रहता है। आप अपने ज्ञान में पारंगत बनें। किसी एक विषय में तो दक्षता हासिल होना ही चाहिए।

4.दोस्त और दुश्मन की पहचान करना सीखें : महाभारत में ऐसे कई मित्र थे जिन्होंने अपनी ही सेना के साथ विश्वासघात किया। ऐसे भी कई लोग थे, जो ऐनवक्त पर पाला बदलकर कौरवों या पांडवों के साथ चले गए। शल्य और युयुत्सु इसके उदाहरण हैं। इसीलिए कहते हैं कि कई बार दोस्त के भेष में दुश्मन हमारे साथ आ जाते हैं और हमसे कई तरह के राज लेते रहते हैं। कुछ ऐसे भी दोस्त होते हैं, जो दोनों तरफ होते हैं। जैसे कौरवों का साथ दे रहे भीष्म, द्रोण और विदुर ने अंतत: में पांडवों का ही साथ दिया।

5.हथियार से ज्यादा घातक बोल वचन : महाभारत का युद्ध नहीं होता यदि कुछ लोग अपने वचनों पर संयम रख लेते। जैसे द्रौपदी यदि दुर्योधन को 'अंधे का पुत्र भी अंधा' नहीं कहती तो महाभारत नहीं होती। शिशुपाल और शकुनी हमेशा चुभने वाली बाते ही करते थे लेकिन उनका हश्र क्या हुआ यह सभी जानते हैं। सबक यह कि कुछ भी बोलने से पहले हमें यह सोच लेना चाहिए कि इसका आपके जीवन, परिवार या राष्ट्र पर क्या असर होगा।

6.जुए-सट्टे से दूर रहो : शकुनि ने पांडवों को फंसाने के लिए जुए का आयोजन किया था जिसके चलते पांडवों ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था। अंत में उन्होंने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया था। यह बात सभी जानते हैं कि फिर क्या हुआ? अत: जुए, सट्टे, षड्यंत्र से हमेशा दूर रहो। ये चीजें मनुष्य का जीवन अंधकारमय बना देती हैं।

7. सदा सत्य के साथ रहो : कौरवों की सेना पांडवों की सेना से कहीं ज्यादा शक्तिशाली थी। एक से एक योद्धा और ज्ञानीजन कौरवों का साथ दे रहे थे। पांडवों की सेना में ऐसे वीर योद्धा नहीं थे। कहते हैं कि विजय उसकी नहीं होती जहां लोग ज्यादा हैं, ज्यादा धनवान हैं या बड़े पदाधिकारी हैं। विजय हमेशा उसकी होती है, जहां ईश्वर है और ईश्वर हमेशा वहीं है, जहां सत्य है इसलिए सत्य का साथ कभी न छोड़ें। अंतत: सत्य की ही जीत होती है। सत्य के लिए जो करना पड़े करो।

8. लड़ाई से डरने वाले मिट जाते हैं : जिंदगी एक उत्सव है, संघर्ष नहीं। लेकिन जीवन के कुछ मोर्चों पर व्यक्ति को लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। जो व्यक्ति लड़ना नहीं जानता, युद्ध उसी पर थोपा जाएगा या उसको सबसे पहले मारा जाएगा। महाभारत में पांडवों को यह बात श्रीकृष्ण ने अच्‍छे से सिखाई थी। पांडव अपने बंधु-बांधवों से लड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन श्रीकृष्ण ने समझाया कि जब किसी मसले का हल शांतिपूर्ण तरीके से नहीं होता, तो फिर युद्ध ही एकमात्र विकल्प बच जाता है। कायर लोग युद्ध से पीछे हटते हैं।

युद्ध भूमि पर पहुंचने के बाद भी अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उससे कहा कि न कोई मरता है और न कोई मारता है। सभी निमित्त मात्र हैं। आत्मा अजर और अमर है... इसलिए मरने या मारने से क्या डरना?

9. खुद नहीं बदलोगे तो समाज तुम्हें बदल देगा : जीवन में हमेशा दानी, उदार और दयालु होने से काम नहीं चलता। महाभारत में जिस तरह से कर्ण की जिंदगी में उतार-चढ़ाव आए, उससे यही सीख मिलती है कि इस क्रूर दुनिया में अपना अस्तित्व बनाए रखना कितना मुश्किल होता है। इसलिए समय के हिसाब से बदलना जरूरी होता है, लेकिन वह बदलाव ही उचित है जिसमें सभी का हित हो। कर्ण ने खुद को बदलकर अपने जीवन के लक्ष्य तो हासिल कर लिया, लेकिन वे फिर भी महान नहीं बन सकें, क्योंकि उन्होंने अपनी शिक्षा का उपयोग समाज से बदला लेने की भावना से किया। बदले की भावना से किया गया कोई भी कार्य आपके समाज का हित नहीं कर सकता।

10. शिक्षा का सदुपयोग जरूरी : समाज ने एक महान योद्धा कर्ण को तिरस्कृत किया था, जो समाज को बहुत कुछ दे सकता था लेकिन समाज ने उसकी कद्र नहीं की, क्योंकि उसमें समाज को मिटाने की भावना थी। कर्ण के लिए शिक्षा का उद्देश्य समाज की सेवा करना नहीं था अपितु वो अपने सामर्थ्य को आधार बनाकर समाज से अपने अपमान का बदला लेना चाहता था। समाज और कर्ण दोनों को ही अपने-अपने द्वारा किए गए अपराध के लिए दंड मिला है और आज भी मिल रहा है। कर्ण यदि यह समझता कि समाज व्यक्तियों का एक जोड़ मात्र है जिसे हम लोगों ने ही बनाया है, तो संभवत: वह समाज को बदलने का प्रयास करता न कि समाज के प्रति घृणा करता।


11.अच्छे दोस्तों की कद्र करो : ईमानदार और बिना शर्त समर्थन देने वाले दोस्त भी आपका जीवन बदल सकते हैं। पांडवों के पास भगवान श्रीकृष्ण थे तो कौरवों के पास महान योद्धा कर्ण थे। इन दोनों ने ही दोनों पक्षों को बिना शर्त अपना पूरा साथ और सहयोग दिया था। यदि कर्ण को छल से नहीं मारा जाता तो कौरवों की जीत तय थी। पांडवों ने हमेशा श्रीकृष्ण की बातों को ध्यान से सुना और उस पर अमल भी किया लेकिन दुर्योधन ने कर्ण को सिर्फ एक योद्धा समझकर उसका पांडवों की सेना के खिलाफ इस्तेमाल किया। यदि दुर्योधन कर्ण की बात मानकर कर्ण को घटोत्कच को मारने के लिए दबाव नहीं डालता, तो इंद्र द्वारा दिया गया जो अमोघ अस्त्र कर्ण के पास था उससे अर्जुन मारा जाता।


12. भावुकता कमजोरी है धृतराष्ट्र अपने पुत्रों को लेकर जरूरत से ज्यादा ही भावुक और आसक्त थे। यही कारण रहा कि उनका एक भी पुत्र उनके वश में नहीं रहा। वे पुत्रमोह में भी अंधे थे। इसी तरह महाभारत में हमें ऐसे कुछ पात्र मिलते हैं जो अपनी भावुकता के कारण मूर्ख ही सिद्ध होते हैं। जरूरत से ज्यादा भावुकता कई बार इंसान को कमजोर बना देती है और वो सही-गलत का फर्क नहीं पहचान पाता। कुछ ऐसा ही हुआ महाभारत में धृतराष्ट्र के साथ, जो अपने पुत्रमोह में आकर सही-गलत का फर्क भूल गए।

13. शिक्षा और योग्यता के लिए जुनूनी बनो व्यक्ति के जीवन में उसके द्वारा हासिल शिक्षा और उसकी कार्य योग्यता ही काम आती है। दोनों के प्रति एकलव्य जैसा जुनून होना चाहिए तभी वह हासिल होती है। अगर आप अपने काम के प्रति जुनूनी हैं तो कोई भी बाधा आपका रास्ता नहीं रोक सकती।

14. कर्मवान बनो इंसान की जिंदगी जन्म और मौत के बीच की कड़ी-भर है। यह जिंदगी बहुत छोटी है। कब दिन गुजर जाएंगे, आपको पता भी नहीं चलेगा इसलिए प्रत्येक दिन का भरपूर उपयोग करना चा‍हिए। कुछ ऐसे भी कर्म करना चाहिए, जो आपके अगले जीवन की तैयारी के हों। ज्यादा से ज्यादा कार्य करो, घर और कार्यालय के अलवा भी ऐसे कार्य करो जिससे आपकी सांतानें आपको याद रखें। गीता यही संदेश देती है कि हर पर ऐसा कार्य कर जो तेरे जीवन को सुंदर बनाए।

15. अहंकार और घमंड होता है पतन का कारण : अपनी अच्छी स्थिति, बैंक-बैलेंस, संपदा, सुंदर रूप और विद्वता का कभी अहंकार मत कीजिए। समय बड़ा बलवान है। धनी, ज्ञानी, शक्तिशाली पांडवों ने वनवास भोगा और अतिसुंदर द्रौपदी भी उनके साथ वनों में भटकती रही। समय के खेल निराले हैं। जिस अंबा का जीवन भीष्म के कारण बर्बाद हो गया था उसने शिखंडी के रूप में जन्म लेकर भीष्म से बदला लिया था। महाभारत में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे यह प्रेरणा मिलती है कि घमंड को पतन का कारण बनने में देर नहीं लगती है।

16. कोई भी संपत्ति किसी की भी नहीं है : अत्यधिक लालच इंसान की जिंदगी को नर्क बना देता है। जो आपका नहीं है उसे अनीतिपूर्वक लेने, हड़पने का प्रयास न करें। आज नहीं तो कल, उसका दंड अवश्य मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि आज जो तेरा है कल (बीता हुआ कल) किसी और का था और कल (आने वाला कल) किसी और का हो जाएगा। अत: तू संपत्ति और वस्तुओं से आसक्ति मत पाल। यह तेरी मृत्यु के बाद यहीं रखे रह जाएंगे। अर्जित करना है तो परिवार का प्रेम और अपनत्व अर्जित कर, जो हमेशा तेरे साथ रहेगा।

17. ज्ञान का हो सही क्रियान्वयन : शिष्य या पुत्र को ज्ञान देना माता-पिता व गुरु का कर्तव्य है, लेकिन सिर्फ ज्ञान से कुछ भी हासिल नहीं होता। बिना विवेक और सद्बुद्धि के ज्ञान अकर्म या विनाश का कारण ही बनता है इसलिए ज्ञान के साथ विवेक और अच्छे संस्कार देने भी जरूरी हैं। हमने ऐसे कई व्यक्ति देखें हैं जो है तो बड़े ज्ञानी लेकिन व्यक्तित्व से दब्बू या खब्बू हैं या किसी जंगल में धूनी रमाकर बैठे हैं। उनके ज्ञान से न तो परिवार का हित हो रहा है और न समाज का। ऐसे लोगों को कहते हैं अपने मियां मिट्ठु। खुद लिखे और खुद ही बांचे।

18. दंड का डर जरूरी : न्याय व्यवस्था वही कायम रख सकता है, जो दंड को सही रूप में लागू करने की क्षमता रखता हो। यह चिंतन घातक है कि 'अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं।'.. दुनियाभर की जेलों से इसके उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं कि जिन अपराधियों को सुधारने की दृष्टि से पुनर्वास कार्यक्रम चलाए गए, उन्होंने समाज में जाकर फिर से अपराध को अंजाम दिया है। अपराधी को हर हाल में दंड मिलना ही चाहिए। यदि उसे दंड नहीं मिलेगा, तो समाज में और भी अपराधी पैदा होंगे और फिर इस तरह संपूर्ण समाज ही अपराधियों का समाज बन जाएगा। युधिष्ठिर के अहिंसा में उनके विश्वास को देखते हुए युद्ध के बाद भीष्म को उन्हें उपदेश देना पड़ा कि राजधर्म में हमेशा दंड की जरूरत होती है, क्योंकि प्रत्येक समाज में अपराधी तो होंगे ही। दंड न देना सबसे बड़ा अपराध होता है।

19. न्याय की रक्षा जरूरी : न्याय हमेशा उन लोगों के साथ होता है, जो शक्तिशाली हैं या जो न्याय पाने के लिए प्राणपन से उत्सुक हैं। जिन्होंने अपने लिए न्याय मांगा है उनके साथ ईश्वर ने न्याय किया भी है। मांगोगे नहीं तो मिलेगा भी नहीं, यह प्रकृति का नियम है। गुरु द्रोणाचार्य ने कर्ण और एकलव्य के साथ जरूर अन्याय किया था लेकिन आज दुनिया अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर नहीं मानती, क्योंकि कर्ण और एकलव्य ने हमेशा न्याय की मांग की और अंत में आज दुनिया उन्हें श्रेष्‍ठ धनुर्धर मानती है। महाभारत हमें सिखाती है कि न्याय की रक्षा करना कितना जरूरी है। लेकिन यह भी एक कटु सत्य है कि न्याय सिर्फ शक्तिशाली लोगों के साथ ही है।

20. छिपे हुए को जानने का ज्ञान जरूरी : यह जगत या व्यक्ति जैसा है, वैसा कभी दिखाई नहीं देता अर्थात लोग जैसे दिखते हैं, वैसे होते नहीं चाहे वह कोई भी हो। महाभारत का हर पात्र ऐसा ही है, रहस्यमयी। छिपे हुए को जानना ही व्यक्ति का लक्ष्य होना चाहिए, क्योंकि ज्ञान ही व्यक्ति को बचाता है। भगवान श्रीकृष्ण के ऐसे कई योद्धा थे जो छिपे हुए सत्य को जानते थे।

21. सफर करने में होती है बरकत : एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना या एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर रहने से लाभ ही मिलता है। पांडवों को हस्तिनापुर छोड़कर दो बार जंगल में रहना पड़ा और अंत में उनको जब खांडवप्रस्थ मिला तो वे वहां चले गए। इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण को भी कई बार मथुरा को छोड़कर जाना पड़ा और अंत में वे द्वारिका में बस गए थे। कई बार लोगों को व्यापार या नौकरी के लिए दूसरे शहर या देश में जाना होता है।

22. गोपनीयता और संयम जरूरी : जीवन हो या युद्ध, सभी जगह गोपनीयता का महत्व है। यदि आप भावना में बहकर किसी को अपने जीवन के राज बताते हैं या किसी व्यक्ति या समाज विशेष पर क्रोध या कटाक्ष करते हैं, तो आप कमजोर माने जाएंगे। महाभारत में ऐसे कई मौके आए जबकि नायकों ने अपने राज ऐसे व्यक्ति के समक्ष खोल दिए, जो राज जानने ही आया था। जिसके चलते ऐसे लोगों को मुंह की खानी पड़ी। दुर्योधन, भीष्म, बर्बरिक ऐसे उदाहण है जिन्होंने अपनी कमजोरी और शक्ति का राज खोल दिया था।

23.चिंता, भय और अशांति है मृत्यु का द्वार : किसी भी प्रकार की चिंता करना, मन को अशांत रखना और व्यर्थ के भय को पालते रहने से मृत्यु आसपास ही मंडराने लगती है। मौत तो सभी को आनी है फिर चिंता किस बात की। कोई पहले मरेगा और कोई बाद में। चिंता का मुख्य कारण मोह है। जेलखान, दावाखाना या पागलखाना वह व्यक्ति जाता है जिसने धर्मसम्मत या संयमित जीवन नहीं जिया। बहुत महात्वाकांशी है या जिसने धन और शक्ति के आधार पर रिश्ते बना रखे हैं या जिसे अपनी संपत्ति की सुरक्षा की चिंता है। महाभारत को पढ़ने से हमें यही शिक्षा मिलती है कि चिंत्तामुक्त जीवन सबसे बड़ी दौलत है।

24. इन्द्रिय संयम जरूरी : इन्द्रियां कभी तृप्त नहीं होतीं। जो इन्द्रियों के वश में है उसका पतन निश्चित है। बहुत से लोग आजकल किसी न किसी प्रकार की आदत या नशे के गुलाम हैं। ऐसे लोगों का धीरे-धीरे क्षरण होता जाता है। इन्द्रिय संयम आता है संकल्प से। महाभारत का हर पात्र संकल्प से बंधा हुआ है। शक्ति का संचय इन्द्रियों को वश में करने से ही संभव हो पाता है।

25.राजा या योद्धा को नहीं करना चाहिए परिणाम की चिंता : कहते हैं कि जो योद्ध या राज युद्ध के परिणाम की चिंता करता है वह अपने जीवन और राज्य को खतरे में डाल देता है। परिणाम की चिंता करने वाला कभी भी साहसपूर्वक न तो निर्णय ले पाता है और न ही युद्ध कर पाता है। जीवन के किसी पर मोड़ पर हमारे निर्णय ही हमारा भविष्य तय करते हैं। एक बार निर्णय ले लेने के बाद फिर बदलने का अर्थ यह है कि आपने अच्छे से सोचकर निर्णय नहीं लिया या आपमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है।.



गीता जीवन के यथार्थ का साक्षात्कार करवाकर जीने की कला सिखाती है, जिसकी आज भी उतनी ही जरूरत है, जितनी पहले थी। गीता एक ऐसा अनुपम ग्रंथ है, जिसका एक श्लोक क्या, एक शब्द भी सदुपदेश से रिक्त नहीं है। गीता की टीकाएं विश्व की लगभग सभी भाषाओं में उपलब्ध हैं।

मान्यता है कि आप यदि नित्य एक अध्याय नहीं पढ़ पाते, तो मात्र एक श्लोक के गूढ़ार्थ को समझने का प्रयास करें, तो इस अभ्यास से धीरे-धीरे गीता आत्मसात हो जाएगी।




'न कोई मरता है और न ही कोई मारता है, सभी निमित्त मात्र हैं...सभी प्राणी जन्म से पहले बिना शरीर के थे, मरने के उपरांत वे बिना शरीर वाले हो जाएँगे। यह तो बीच में ही शरीर वाले देखे जाते हैं, फिर इनका शोक क्यों करते हो।'- कृष्ण

हिन्दू धर्म के एकमात्र धर्मग्रंथ है वेद। वेदों के चार भाग हैं- ऋग, यजु, साम और अथर्व। वेदों के सार को वेदांत या उपनिषद कहते हैं और उपनिषदों का सार या निचोड़ गीता में हैं। गीता हिन्दुओं का सर्वमान्य एकमात्र धर्मग्रंथ है।

1.गीता के ज्ञान को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कुरुक्षेत्र में खड़े होकर दिया था। यह श्रीकृष्‍ण-अर्जुन संवाद नाम से विख्‍यात है।

2.वैसे तो गीता श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ एक संवाद है, लेकिन कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण के माध्यम से उस कालरूप परम परमेश्वर ने गीता का ज्ञान विश्व को दिया। श्रीकृष्ण उस समय योगारूढ़ थे।

3. गीता के चौथे अध्याय में कृष्णजी कहते हैं कि पूर्व काल में यह योग मैंने विवस्वान को बताया था। विवस्वान ने मनु से कहा। मनु ने इक्ष्वाकु को बताया। यूं पीढ़ी दर पीढ़ी परम्परा से प्राप्त इस ज्ञान को राजर्षियों ने जाना पर कालान्तर में यह योग लुप्त हो गया। और अब उस पुराने योग को ही तुम्हें पुन: बता रहा हूं। परंपरा से यह ज्ञान सबसे पहले विवस्वान् (सूर्य) को मिला था। जिसके पुत्र वैवस्वत मनु थे।

4. श्रीकृष्ण के गुरु घोर अंगिरस थे। घोर अंगिरस ने देवकी पुत्र कृष्ण को जो उपदेश दिया था वही उपदेश श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन को देते हैं। छांदोग्य उपनिषद में उल्लेख मिलता है कि देवकी पुत्र कृष्‍ण घोर अंगिरस के शिष्य हैं और वे गुरु से ऐसा ज्ञान अर्जित करते हैं जिससे फिर कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रह जाता है। यद्यपि गीता द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के समय रणभूमि में किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को समझाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा कही गई थी, किंतु इस वचनामृत की प्रासंगिकता आज तक बनी हुई है।
5 गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म मार्ग की चर्चा की गई है। उसमें यम-नियम और धर्म-कर्म के बारे में भी बताया गया है। गीता ही कहती है कि ब्रह्म (ईश्वर) एक ही है। गीता को बार-बार पढ़ेंगे तो आपके समक्ष इसके ज्ञान का रहस्य खुलता जाएगा। गीता के प्रत्येक शब्द पर एक अलग ग्रंथ लिखा जा सकता है। गीता में सृष्टि उत्पत्ति, जीव विकासक्रम, हिन्दू संदेवाहक क्रम, मानव उत्पत्ति, योग, धर्म, कर्म, ईश्वर, भगवान, देवी, देवता, उपासना, प्रार्थना, यम, नियम, राजनीति, युद्ध, मोक्ष, अंतरिक्ष, आकाश, धरती, संस्कार, वंश, कुल, नीति, अर्थ, पूर्वजन्म, जीवन प्रबंधन, राष्ट्र निर्माण, आत्मा, कर्मसिद्धांत, त्रिगुण की संकल्पना, सभी प्राणियों में मैत्रीभाव आदि सभी की जानकारी है।

06 श्रीमद्भगवद्गीता योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी है। इसके प्रत्येक श्लोक में ज्ञानरूपी प्रकाश है, जिसके प्रस्फुटित होते ही अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।

7. 3112 ईसा पूर्व हुए भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। कलियुग का आरंभ शक संवत से 3176 वर्ष पूर्व की चैत्र शुक्ल एकम (प्रतिपदा) को हुआ था। वर्तमान में 1939 शक संवत है। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईपू में हुआ। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी तभी से कलियुग का आरंभ माना जाता है। उनकी मृत्यु एक बहेलिए का तीर लगने से हुई थी। तब उनकी तब उनकी उम्र 119 वर्ष थी। इसका मतलब की आर्यभट्ट के गणना अनुसार गीता का ज्ञान 5154 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था।

8.हरियाणा के कुरुक्षे‍त्र में जब यह ज्ञान दिया गया तब तिथि एकादशी थी। संभवत: उस दिन रविवार था। उन्होंने यह ज्ञान लगभग 45 मिनट तक दिया था। गीता में श्रीकृष्ण ने- 574, अर्जुन ने- 85, संजय ने 40 और धृतराष्ट्र ने- 1 श्लोक कहा है।

9. गीता की गणना उपनिषदों में की जाती है। इसी‍लिये इसे गीतोपनिषद् भी कहा जाता है। दरअसल, यह महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है। महाभारत में ही कुछ स्थानों पर उसका हरिगीता नाम से उल्लेख हुआ है। (शान्ति पर्व अ. 346.10, अ. 348.8 व 53)।

10. श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान अर्जुन को इसलिये दिया क्योंकि वह कर्त्तव्य पथ से भटकर संन्यासी और वैरागी जैसा आचरण करके युद्ध छोड़ने को आतुर हो गया था वह भी ऐसे समय जब की सेना मैदान में डटी थी। ऐसे में श्रीकृष्ण को उन्हें उनका कर्तव्य निभाने के लिए यह ज्ञान दिया। गीता को अर्जुन के अलावा और संजय ने सुना और उन्होंने धृतराष्ट्र को सुनाया।

11. गीता एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जिस पर दुनियाभर की भाषा में सबसे ज्यादा भाष्य, टीका, व्याख्या, टिप्पणी, निबंध, शोधग्रंथ आदि लिखे गए हैं। आदि शंकराचार्य, रामानुज, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्क, भास्कर, वल्लभ, श्रीधर स्वामी, आनन्द गिरि, मधुसूदन सरस्वती, संत ज्ञानेश्वर, बालगंगाधर तिलक, परमहंस योगानंद, महात्मा गांधी, सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन, महर्षि अरविन्द घोष, एनी बेसेन्ट, गुरुदत्त, विनोबा भावे, स्वामी चिन्मयानन्द, चैतन्य महाप्रभु, स्वामी नारायण, जयदयाल गोयन्दका, ओशो रजनीश, स्वामी क्रियानन्द, स्वामी रामसुखदास, श्रीराम शर्मा आचार्य आदि सैंकड़ों विद्वानों ने गीता पर भाष्य लिखे या प्रवचन दिए हैं। लेकिन कहते हैं कि ओशो रजनीश ने जो गीता पर प्रवचन दिए हैं वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्रवचन हैं।

किस समय, किसने गीता को महाभारत से अलग कर एक स्वतंत्र ग्रंथ का रूप दिया इसका कोई प्रमाण कहीं नहीं मिलता। आदि शंकराचार्य द्वारा भाष्य रचे जाने पर गीता जिस तरह प्रमाण ग्रंथ के रूप में पूजित हुई है, क्या वही स्थिति उसे इसके पूर्व भी प्राप्त थी, इसका निर्णय कर पाना कठिन है।


                                                              सचिन मिश्रा 

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